श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना  »  श्लोक 147
 
 
श्लोक  5.1.147 
बलमिच्छामहे ज्ञातुं भूयश्चास्य पराक्रमम्।
त्वां विजेष्यत्युपायेन विषादं वा गमिष्यति॥ १४७॥
 
 
अनुवाद
हम हनुमानजी के बल और पराक्रम की पुनः परीक्षा करना चाहते हैं। या तो वे किसी प्रकार तुम्हें परास्त कर देंगे या फिर दुःख में पड़ जाएँगे (इससे उनका बल प्रकट हो जाएगा)॥147॥
 
‘We want to test Hanuman ji's strength and valour once again. Either he will defeat you by some means or he will fall into sorrow (this will reveal his strength)'॥ 147॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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