श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना  »  श्लोक 145
 
 
श्लोक  5.1.145 
अयं वातात्मज: श्रीमान् प्लवते सागरोपरि।
हनूमान् नाम तस्य त्वं मुहूर्तं विघ्नमाचर॥ १४५॥
 
 
अनुवाद
ये पवनप्रिय श्री हनुमान जी समुद्र के ऊपर जा रहे हैं। आपने उनके मार्ग में क्षण भर के लिए बाधा डाल दी है ॥145॥
 
This wind-loving Mr. Hanuman ji is going over the sea. You put an obstacle in their path for a moment. 145॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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