श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना  »  श्लोक 142
 
 
श्लोक  5.1.142 
स तत् प्रहर्षमलभद् विपुलं पर्वतोत्तम:।
देवतानां पतिं दृष्ट्वा परितुष्टं शतक्रतुम्॥ १४२॥
 
 
अनुवाद
देवताओं के स्वामी शतक्रतु इन्द्र को संतुष्ट देखकर पर्वतों में श्रेष्ठ मैनाक को बहुत प्रसन्नता हुई ॥142॥
 
Seeing Satkratu Indra, the lord of the gods, satisfied, Mainak, the best among the mountains, felt very happy. 142॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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