श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  5.1.14 
तेन चोत्तमवीर्येण पीडॺमान: स पर्वत:।
सलिलं सम्प्रसुस्राव मदमत्त इव द्विप:॥ १४॥
 
 
अनुवाद
महाबली हनुमान्‌जी के द्वारा दबा हुआ महेन्द्र पर्वत जल की धाराएँ छोड़ने लगा, मानो कोई मतवाला हाथी अपने घुटनों से मद की धारा बहा रहा हो ॥14॥
 
The Mahendra mountain, suppressed by the mighty Hanuman, began to gush out streams of water, as if a drunken elephant were pouring a stream of intoxication from its haunches. ॥14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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