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ramayan 5.1.130: मैनाक के ऐसा कहने पर वानरों में श्रेष्ठ हनुमान जी ने उस महान पर्वत से कहा - 'मैनाक! मैं भी तुमसे मिलकर बहुत प्रसन्न हूँ। मेरा आतिथ्य किया गया है। अब तुम अपने मन से यह शोक या चिंता निकाल दो कि तुमने मेरी पूजा स्वीकार नहीं की॥ 130॥   |   ramayan सर्ग 5.1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना   ।   ramayan काण्ड 5: सुन्दर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना  »  श्लोक 130
 
 
श्लोक  5.1.130 
एवमुक्त: कपिश्रेष्ठस्तं नगोत्तममब्रवीत्।
प्रीतोऽस्मि कृतमातिथ्यं मन्युरेषोऽपनीयताम्॥ १३०॥
 
 
अनुवाद
मैनाक के ऐसा कहने पर वानरों में श्रेष्ठ हनुमान जी ने उस महान पर्वत से कहा - 'मैनाक! मैं भी तुमसे मिलकर बहुत प्रसन्न हूँ। मेरा आतिथ्य किया गया है। अब तुम अपने मन से यह शोक या चिंता निकाल दो कि तुमने मेरी पूजा स्वीकार नहीं की॥ 130॥
 
On Mainak saying this, the best of the apes, Hanuman ji said to that great mountain - 'Mainak! I am also very happy to meet you. I have been hosted. Now remove from your mind this sorrow or worry that you did not accept my worship.॥ 130॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)