श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना  »  श्लोक 124
 
 
श्लोक  5.1.124 
तत: क्रुद्ध: सहस्राक्ष: पर्वतानां शतक्रतु:।
पक्षांश्चिच्छेद वज्रेण तत: शतसहस्रश:॥ १२४॥
 
 
अनुवाद
इससे सहस्र नेत्रों वाले देवराज इन्द्र क्रोधित हो गए और उन्होंने अपने व्रज से लाखों पर्वतों के पंख काट डाले॥124॥
 
This infuriated Lord Indra, the thousand-eyed king of gods, and he cut off the wings of millions of mountains from his Vraja.॥ 124॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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