श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना  »  श्लोक 119
 
 
श्लोक  5.1.119 
अतिथि: किल पूजार्ह: प्राकृतोऽपि विजानता।
धर्मं जिज्ञासमानेन किं पुनर्यादृशो भवान्॥ ११९॥
 
 
अनुवाद
धर्म के जिज्ञासु विद्वान पुरुष के लिए तो साधारण अतिथि भी पूज्य माना जाता है, फिर आप जैसे असाधारण वीर पुरुष कितने आदर के पात्र हैं, यह तो कहना ही क्या?॥119॥
 
‘For a learned man who is curious about religion, even an ordinary guest is certainly considered worthy of worship. Then what can be said about how much respect an exceptionally brave man like you deserves?॥ 119॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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