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ramayan 5.1.100: ककुत्स्थ कुल के श्री रामचन्द्रजी की दयालुता, मिथिला की पुत्री सीता की परदेश में रहने की विवशता तथा वानरराज हनुमानजी के प्रयत्न देखकर तुम्हें अवश्य उठना चाहिए। ॥100॥   |   ramayan सर्ग 5.1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना   ।   ramayan काण्ड 5: सुन्दर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना  »  श्लोक 100
 
 
श्लोक  5.1.100 
काकुत्स्थस्यानृशंस्यं च मैथिल्याश्च विवासनम्।
श्रमं च प्लवगेन्द्रस्य समीक्ष्योत्थातुमर्हसि॥ १००॥
 
 
अनुवाद
ककुत्स्थ कुल के श्री रामचन्द्रजी की दयालुता, मिथिला की पुत्री सीता की परदेश में रहने की विवशता तथा वानरराज हनुमानजी के प्रयत्न देखकर तुम्हें अवश्य उठना चाहिए। ॥100॥
 
"Seeing the kindness of Kakutstha clan's Sri Ramachandra, the compulsion of Mithila's daughter Sita to live in a foreign land and the efforts of the monkey king Hanuman, you must rise up." ॥100॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)