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श्लोक 4.9.12  |
तं प्रविष्टं रिपुं दृष्ट्वा बिलं रोषवशं गत:।
मामुवाच ततो वाली वचनं क्षुभितेन्द्रिय:॥ १२॥ |
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| अनुवाद |
| शत्रु को उस छिद्र में घुसते देख वालि के क्रोध की सीमा न रही, उसकी सारी इन्द्रियाँ व्याकुल हो गईं और वह मुझसे इस प्रकार बोला -॥12॥ |
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| On seeing the enemy enter the hole, Vali's anger knew no bounds. All his senses were agitated and he spoke to me thus -॥ 12॥ |
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