श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 7: सुग्रीव का श्रीराम को समझाना तथा श्रीराम का सुग्रीव को उनकी कार्य सिद्धि का विश्वास दिलाना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  4.7.5 
अलं वैक्लव्यमालम्ब्य धैर्यमात्मगतं स्मर।
त्वद्विधानां न सदृशमीदृशं बुद्धिलाघवम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार मन को विचलित करना व्यर्थ है। अपने हृदय में स्वाभाविक रूप से विद्यमान धैर्य का स्मरण करो। मन और विचारों को इस प्रकार हलका करना – उनकी स्वाभाविक गम्भीरता को खो देना – आप जैसे महापुरुषों के लिए उचित नहीं है॥5॥
 
‘It is futile to disturb the mind in this manner. Remember the patience that is naturally present in your heart. To make the mind and thoughts light in this manner – to lose their natural seriousness – is not appropriate for great men like you.॥ 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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