श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 7: सुग्रीव का श्रीराम को समझाना तथा श्रीराम का सुग्रीव को उनकी कार्य सिद्धि का विश्वास दिलाना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  4.7.17 
कर्तव्यं यद् वयस्येन स्निग्धेन च हितेन च।
अनुरूपं च युक्तं च कृतं सुग्रीव तत् त्वया॥ १७॥
 
 
अनुवाद
सुग्रीव! तुमने वही किया जो एक प्रेमपूर्ण और हितैषी मित्र को करना चाहिए। तुम्हारा कार्य सर्वथा उचित और तुम्हारे योग्य है॥17॥
 
‘Sugreeva! You have done what a loving and well wishing friend should do. Your action is absolutely right and worthy of you.॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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