श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 66: जाम्बवान् का हनुमानजी को उनकी उत्पत्ति कथा सुनाकर समुद्रलङ्घन के लिये उत्साहित करना  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  4.66.35 
तद् विजृम्भस्व विक्रान्त प्लवतामुत्तमो ह्यसि।
त्वद्वीर्यं द्रष्टुकामा हि सर्वा वानरवाहिनी॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
अतः हे वीर योद्धा! अपनी अपार शक्ति का विस्तार करो। तुम कूदनेवालों में श्रेष्ठ हो। यह समस्त वानर सेना तुम्हारा बल और पराक्रम देखना चाहती है॥ 35॥
 
‘Therefore, O valiant warrior! Expand your immense power. You are the best among jumpers. This entire monkey army wants to see your strength and prowess.॥ 35॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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