श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 66: जाम्बवान् का हनुमानजी को उनकी उत्पत्ति कथा सुनाकर समुद्रलङ्घन के लिये उत्साहित करना  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  4.66.33 
तथा चौषधयोऽस्माभि: संचिता देवशासनात्।
निर्मथ्यममृतं याभिस्तदानीं नो महद‍्बलम्॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
समुद्र-मंथन के समय देवताओं की आज्ञा से हमने वे औषधियाँ एकत्रित की थीं जिनसे अमृत निकाला जाना था। उन दिनों हममें बड़ा बल था॥33॥
 
‘At the time of the churning of the ocean, by the order of the gods we had collected those medicinal herbs with which the nectar was to be churned out. In those days we had great strength.॥ 33॥
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