श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 66: जाम्बवान् का हनुमानजी को उनकी उत्पत्ति कथा सुनाकर समुद्रलङ्घन के लिये उत्साहित करना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  4.66.32 
त्रिविक्रमे मया तात सशैलवनकानना।
त्रि:सप्तकृत्व: पृथिवी परिक्रान्ता प्रदक्षिणम्॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
पिताश्री! जब भगवान वामन ने तीनों लोकों को नापने के लिए अपना पैर बढ़ाया, तब मैंने पर्वतों, वनों और जंगलों सहित सम्पूर्ण पृथ्वी की इक्कीस बार परिक्रमा कर ली।
 
Father! When Lord Vamana extended his foot to measure the three worlds, I circumambulated the entire earth including the mountains, forests and jungles twenty-one times.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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