श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 66: जाम्बवान् का हनुमानजी को उनकी उत्पत्ति कथा सुनाकर समुद्रलङ्घन के लिये उत्साहित करना  »  श्लोक 28-29h
 
 
श्लोक  4.66.28-29h 
वज्रस्य च निपातेन विरुजं त्वां समीक्ष्य च।
सहस्रनेत्र: प्रीतात्मा ददौ ते वरमुत्तमम्॥ २८॥
स्वच्छन्दतश्च मरणं तव स्यादिति वै प्रभो।
 
 
अनुवाद
प्रभु! वज्र से आहत होने पर भी आपको अक्षुण्ण देखकर सहस्र नेत्रों वाले इन्द्र बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने आपको यह महान वर दिया - 'मृत्यु आपकी इच्छा पर निर्भर होगी - आप जब चाहें, तभी मर सकेंगे, अन्यथा नहीं।'॥28 1/2॥
 
Lord! Seeing you unharmed even after being struck by the thunderbolt, the thousand-eyed Indra was very pleased and he granted you this great boon - 'Death will be at the mercy of your will - you will be able to die only when you wish, not otherwise.'॥ 28 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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