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श्लोक 4.65.34  |
तस्य ते वीर कार्यस्य न किंचित् परिहास्यते।
एष संचोदयाम्येनं य: कार्यं साधयिष्यति॥ ३४॥ |
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| अनुवाद |
| वीर! तुम्हारे कार्य में किंचितमात्र भी त्रुटि नहीं होगी। अब मैं ऐसे वीर को प्रेरित कर रहा हूँ जो इस कार्य को पूर्ण कर सकेगा।॥ 34॥ |
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| ‘Veer! There will not be even the slightest mistake in your task. Now I am inspiring such a brave person who will be able to accomplish this task.’॥ 34॥ |
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