श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 65: जाम्बवान् और अङ्गद की बातचीत तथा जाम्बवान् का हनुमान्जी को प्रेरित करने के लिये उनके पास जाना  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  4.65.34 
तस्य ते वीर कार्यस्य न किंचित् परिहास्यते।
एष संचोदयाम्येनं य: कार्यं साधयिष्यति॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
वीर! तुम्हारे कार्य में किंचितमात्र भी त्रुटि नहीं होगी। अब मैं ऐसे वीर को प्रेरित कर रहा हूँ जो इस कार्य को पूर्ण कर सकेगा।॥ 34॥
 
‘Veer! There will not be even the slightest mistake in your task. Now I am inspiring such a brave person who will be able to accomplish this task.’॥ 34॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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