श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 65: जाम्बवान् और अङ्गद की बातचीत तथा जाम्बवान् का हनुमान्जी को प्रेरित करने के लिये उनके पास जाना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  4.65.32 
तत्तथा ह्यस्य कार्यस्य न भवत्यन्यथा गति:।
तद् भवानेव दृष्टार्थ: संचिन्तयितुमर्हति॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
अतः तुम कोई ऐसा उपाय सोचो जिससे सीता के दर्शन के इस कार्य में कोई बाधा न आए; क्योंकि तुम्हें सब वस्तुओं का अनुभव है। ॥32॥
 
"Therefore you should think of a way by which there will be no hindrance in the accomplishment of this task of seeing Sita; because you have the experience of all things." ॥ 32॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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