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श्लोक 4.65.31  |
स हि प्रसादे चात्यर्थकोपे च हरिरीश्वर:।
अतीत्य तस्य संदेशं विनाशो गमने भवेत्॥ ३१॥ |
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| अनुवाद |
| वे हम पर कृपा करने में समर्थ हैं और अत्यन्त क्रोधपूर्वक दण्ड देने में भी समर्थ हैं। यदि हम उनकी आज्ञा का उल्लंघन करेंगे, तो हमारा विनाश अवश्यंभावी है॥31॥ |
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| ‘He is capable of showering His blessings on us and also of punishing us in extreme anger. If we violate His command, our destruction is inevitable.॥ 31॥ |
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