श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 65: जाम्बवान् और अङ्गद की बातचीत तथा जाम्बवान् का हनुमान्जी को प्रेरित करने के लिये उनके पास जाना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  4.65.31 
स हि प्रसादे चात्यर्थकोपे च हरिरीश्वर:।
अतीत्य तस्य संदेशं विनाशो गमने भवेत्॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
वे हम पर कृपा करने में समर्थ हैं और अत्यन्त क्रोधपूर्वक दण्ड देने में भी समर्थ हैं। यदि हम उनकी आज्ञा का उल्लंघन करेंगे, तो हमारा विनाश अवश्यंभावी है॥31॥
 
‘He is capable of showering His blessings on us and also of punishing us in extreme anger. If we violate His command, our destruction is inevitable.॥ 31॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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