श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 65: जाम्बवान् और अङ्गद की बातचीत तथा जाम्बवान् का हनुमान्जी को प्रेरित करने के लिये उनके पास जाना  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  4.65.30 
नह्यकृत्वा हरिपते: संदेशं तस्य धीमत:।
तत्रापि गत्वा प्राणानां न पश्ये परिरक्षणम्॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
यदि हम बुद्धिमान वानरराज सुग्रीव की आज्ञा का पालन किए बिना किष्किन्धा लौट जाएँ, तो वहाँ भी हमें अपने प्राण बचाने का कोई उपाय न दिखाई देगा॥30॥
 
‘If we go back to Kishkinda without following the orders of the wise monkey king Sugreeva, we will not see any way to save our lives even there.॥ 30॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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