श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 65: जाम्बवान् और अङ्गद की बातचीत तथा जाम्बवान् का हनुमान्जी को प्रेरित करने के लिये उनके पास जाना  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  4.65.24 
अपि वै तस्य कार्यस्य भवान् मूलमरिंदम।
तस्मात् कलत्रवत् तात प्रतिपाल्य: सदा भवान्॥ २४॥
 
 
अनुवाद
हे शत्रुओं का नाश करने वाले! पिता! आप ही उस कार्य के मूल हैं; इसलिए आपको पत्नी के समान सदैव सम्मान देना उचित है॥ 24॥
 
O destroyer of enemies! Father! You are the root of that task; therefore it is always appropriate to respect you like a wife.॥ 24॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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