श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 65: जाम्बवान् और अङ्गद की बातचीत तथा जाम्बवान् का हनुमान्जी को प्रेरित करने के लिये उनके पास जाना  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  4.65.23 
भवान् कलत्रमस्माकं स्वामिभावे व्यवस्थित:।
स्वामी कलत्रं सैन्यस्य गतिरेषा परंतप॥ २३॥
 
 
अनुवाद
'तुम्हारी रक्षा पत्नी के समान होनी चाहिए, (जैसे स्त्री अपने पति के हृदय की स्वामिनी होती है, वैसे ही) तुम हमारे स्वामी के पद पर विराजमान हो। हे प्रभु! सेना के लिए स्वामी की रक्षा पत्नी के समान होनी चाहिए। ऐसी प्रजा की मान्यता है।॥23॥
 
‘You are to be protected like a wife (wife), (just as a woman is the mistress of her husband's heart, similarly) you are enthroned in the position of our master. O Lord! A master is to be protected like a wife (wife) for the army. This is the belief of the people.॥ 23॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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