श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 65: जाम्बवान् और अङ्गद की बातचीत तथा जाम्बवान् का हनुमान्जी को प्रेरित करने के लिये उनके पास जाना  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  4.65.19 
अहमेतद् गमिष्यामि योजनानां शतं महत्।
निवर्तने तु मे शक्ति: स्यान्न वेति न निश्चितम्॥ १९॥
 
 
अनुवाद
मैं इस समुद्र की सौ योजन की विशाल दूरी पार कर लूँगा, परन्तु वहाँ से लौटने के लिए मुझमें उतनी ही शक्ति होगी या नहीं, यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता। ॥19॥
 
"I shall cross the vast distance of a hundred yojanas of this ocean, but whether I shall have the same strength to return from there or not cannot be said with certainty." ॥19॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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