श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 65: जाम्बवान् और अङ्गद की बातचीत तथा जाम्बवान् का हनुमान्जी को प्रेरित करने के लिये उनके पास जाना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  4.65.17 
सम्प्रत्येतावदेवाद्य शक्यं मे गमने स्वत:।
नैतावता च संसिद्धि: कार्यस्यास्य भविष्यति॥ १७॥
 
 
अनुवाद
इस समय मुझमें इतनी ही शक्ति है कि मैं स्वयं चल सकूँ, परन्तु इस गति से मैं समुद्र पार करने का यह वर्तमान कार्य पूरा नहीं कर सकता।॥17॥
 
At present I have only this much strength to walk on my own, but at this speed I cannot accomplish this current task of crossing the ocean.'॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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