श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 64: समुद्र की विशालता देखकर विषाद में पड़े हुए वानरों को आश्वासन दे अङ्गद का उनसे पृथक्-पृथक् समुद्र-लङ्घन के लिये उनकी शक्ति पूछना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  4.64.17 
कस्य प्रसादाद् दारांश्च पुत्रांश्चैव गृहाणि च।
इतो निवृत्ता: पश्येम सिद्धार्था: सुखिनो वयम्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
‘किसकी कृपा से हम लोग यहाँ से सुखपूर्वक और सब मनोकामनाएँ पूर्ण करके लौटेंगे और अपने घर तथा स्त्री-बालकों का मुख देख सकेंगे?॥17॥
 
‘By whose grace we shall return from here happily and with all our wishes fulfilled and shall be able to see our homes and the faces of our wives and children?॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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