श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 63: सम्पाति का पंखयुक्त होकर वानरों को उत्साहित करके उड़ जाना और वानरों का वहाँ से दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान करना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  4.63.2 
कन्दरात् तु विसर्पित्वा पर्वतस्य शनै: शनै:।
अहं विन्ध्यं समारुह्य भवत: प्रतिपालये॥ २॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् मैं धीरे-धीरे गुफा से बाहर आकर विन्ध्य पर्वत के शिखर पर चढ़ गया और तब से आप सबके आने की प्रतीक्षा कर रहा हूँ॥ 2॥
 
Thereafter I slowly came out of the cave and climbed to the peak of Vindhya mountain and since then I am waiting for you all to come.॥ 2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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