श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 63: सम्पाति का पंखयुक्त होकर वानरों को उत्साहित करके उड़ जाना और वानरों का वहाँ से दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान करना  »  श्लोक 11-12h
 
 
श्लोक  4.63.11-12h 
यौवने वर्तमानस्य ममासीद् य: पराक्रम:॥ ११॥
तमेवाद्यावगच्छामि बलं पौरुषमेव च।
 
 
अनुवाद
'जैसे युवावस्था में मुझमें वीरता और बल था, वैसे ही अब मैं उसी बल और पुरुषत्व का अनुभव कर रहा हूँ। 11 1/2।
 
‘Just as I had valour and strength in my youth, I am experiencing the same strength and manliness now. 11 1/2.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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