श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 62: निशाकर मुनि का सम्पाति को सान्त्वना देते हुए उन्हें भावी श्रीरामचन्द्रजी के कार्य में सहायता देने के लिये जीवित रहने का आदेश देना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  4.62.8 
परमान्नं च वैदेह्या ज्ञात्वा दास्यति वासव:।
यदन्नममृतप्रख्यं सुराणामपि दुर्लभम्॥ ८॥
 
 
अनुवाद
यह जानकर कि सीता राक्षस का भोजन स्वीकार नहीं करती, भगवान इन्द्र उन्हें अमृत के समान खीर खिलाएँगे, जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। ॥8॥
 
On knowing that Sita does not accept the food of the demon, Lord Indra will offer her kheer (rice pudding) which is like nectar, which is rare even for the gods. ॥ 8॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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