श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 62: निशाकर मुनि का सम्पाति को सान्त्वना देते हुए उन्हें भावी श्रीरामचन्द्रजी के कार्य में सहायता देने के लिये जीवित रहने का आदेश देना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  4.62.2 
पक्षौ च ते प्रपक्षौ च पुनरन्यौ भविष्यत:।
चक्षुषी चैव प्राणाश्च विक्रमश्च बलं च ते॥ २॥
 
 
अनुवाद
'सम्पते! चिन्ता मत करो। तुम्हारे छोटे-बड़े पंख पुनः उग आएंगे। तुम्हारी आँखें भी अच्छी हो जाएँगी और तुम्हारी खोई हुई प्राणशक्ति, बल और पराक्रम पुनः लौट आएंगे।॥2॥
 
‘Sampathe! Do not worry. Your wings, both big and small, will grow again. Your eyes will also become fine and your lost life force, strength and valour will return.॥ 2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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