श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 62: निशाकर मुनि का सम्पाति को सान्त्वना देते हुए उन्हें भावी श्रीरामचन्द्रजी के कार्य में सहायता देने के लिये जीवित रहने का आदेश देना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  4.62.1 
एवमुक्त्वा मुनिश्रेष्ठमरुदं भृशदु:खित:।
अथ ध्यात्वा मुहूर्तं च भगवानिदमब्रवीत्॥ १॥
 
 
अनुवाद
'हे वानरों! उन महर्षि से ऐसा कहकर मैं अत्यन्त दुःखी होकर विलाप करने लगा। मेरी बात सुनकर और कुछ देर ध्यान करके महर्षि भगवान निशाकर ने कहा -॥1॥
 
‘O monkeys! Having said this to that great sage, I became very sad and started wailing. After listening to me and meditating for a while, Maharishi Bhagwan Nishakar said -॥ 1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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