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ramayan 4.61.3: जटायु और मैं दोनों ही अभिमान से भर गए थे; इसलिए अपने पराक्रम की परीक्षा करने के लिए हम दोनों जहाँ तक संभव हो सके, वहाँ तक पहुँचने के लिए उड़ने लगे॥3॥   |   ramayan सर्ग 4.61: सम्पाति का निशाकर मुनि को अपने पंख के जलने का कारण बताना   ।   ramayan काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 61: सम्पाति का निशाकर मुनि को अपने पंख के जलने का कारण बताना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  4.61.3 
अहं चैव जटायुश्च संघर्षाद् गर्वमोहितौ।
आकाशं पतितौ दूराज्जिज्ञासन्तौ पराक्रमम्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
जटायु और मैं दोनों ही अभिमान से भर गए थे; इसलिए अपने पराक्रम की परीक्षा करने के लिए हम दोनों जहाँ तक संभव हो सके, वहाँ तक पहुँचने के लिए उड़ने लगे॥3॥
 
Both Jatayu and I were filled with pride; so in order to test our prowess, we both began flying to reach as far as possible.॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)