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ramayan 4.61.11: उस समय न दक्षिण दिशा का ज्ञान था, न अग्निकोण का और न पश्चिम दिशा आदि का। यद्यपि यह जगत् नियमित रूप से स्थित था, तथापि उस समय यह नष्टप्राय सा प्रतीत होता था मानो अंत समय में अग्नि से जल गया हो ॥11॥   |   ramayan सर्ग 4.61: सम्पाति का निशाकर मुनि को अपने पंख के जलने का कारण बताना   ।   ramayan काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 61: सम्पाति का निशाकर मुनि को अपने पंख के जलने का कारण बताना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  4.61.11 
न च दिग् ज्ञायते याम्या न चाग्नेयी न वारुणी।
युगान्ते नियतो लोको हतो दग्ध इवाग्निना॥ ११॥
 
 
अनुवाद
उस समय न दक्षिण दिशा का ज्ञान था, न अग्निकोण का और न पश्चिम दिशा आदि का। यद्यपि यह जगत् नियमित रूप से स्थित था, तथापि उस समय यह नष्टप्राय सा प्रतीत होता था मानो अंत समय में अग्नि से जल गया हो ॥11॥
 
At that time there was no knowledge of the south direction, nor of the angle of fire or the west etc. Although this world was situated regularly, yet at that time it appeared almost destroyed as if it had been burnt by fire in the end times. 11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)