श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 6: सुग्रीव का श्रीराम को सीताजी के आभूषण दिखाना तथा श्रीराम का शोक एवं रोषपूर्ण वचन  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  4.6.27 
मम दयिततमा हृता वनाद्
रजनिचरेण विमथ्य येन सा।
कथय मम रिपुं तमद्य वै
प्लवगपते यमसंनिधिं नयामि॥ २७॥
 
 
अनुवाद
वानरराज! जिस राक्षस ने मुझे धोखा दिया, मेरा अपमान किया और मेरे प्रियतम को वन से हरण किया, वही मेरा सबसे बड़ा शत्रु है। मुझे उसका पता बताओ। मैं उसे अभी यमराज के पास ले जाता हूँ।॥27॥
 
Monkey King! The demon who deceived me, insulted me and kidnapped my beloved from the forest is my biggest enemy. Tell me his whereabouts. I will take him to Yamraj right now.'॥ 27॥
 
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे षष्ठ: सर्ग:॥ ६॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें छठा सर्ग पूरा हुआ॥ ६॥
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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