श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 59: सम्पाति का अपने पुत्र सुपार्श्व के मुख से सुनी हुई सीता और रावण को देखने की घटना का वृत्तान्त बताना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  4.59.12 
अहं तात यथाकालमामिषार्थी खमाप्लुत:।
महेन्द्रस्य गिरेर्द्वारमावृत्य सुसमाश्रित:॥ १२॥
 
 
अनुवाद
पिताश्री! मैं समय पर मांस प्राप्त करने की इच्छा से आकाश में उड़कर महेन्द्र पर्वत के द्वार पर खड़ा हो गया॥12॥
 
Father! Desiring to obtain meat at the right time, I flew into the sky and stood at the gate of Mahendra mountain.॥ 12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)