श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 58: सम्पाति का अपने पंख जलने की कथा सुनाना, सीता और रावण का पता बताना तथा वानरों की सहायता से समुद्र-तट पर जाकर भाई को जलाञ्जलि देना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  4.58.7 
निर्दग्धपत्र: पतितो विन्ध्येऽहं वानरर्षभा:।
अहमस्मिन् वसन् भ्रातु: प्रवृत्तिं नोपलक्षये॥ ७॥
 
 
अनुवाद
हे वानर-मुख! उस समय मेरे दोनों पंख जल गए और मैं इस विन्ध्य पर्वत पर गिर पड़ा। यहाँ रहकर मैं अपने भाई का समाचार कभी न पा सका (आज पहली बार मुझे तुम लोगों से उसकी मृत्यु का समाचार ज्ञात हुआ है)॥7॥
 
O monkey-head! At that time both my wings got burnt and I fell on this Vindhya mountain. Staying here I could never get the news of my brother (today for the first time I have come to know about his death from you people)'॥ 7॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd