| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड » सर्ग 58: सम्पाति का अपने पंख जलने की कथा सुनाना, सीता और रावण का पता बताना तथा वानरों की सहायता से समुद्र-तट पर जाकर भाई को जलाञ्जलि देना » श्लोक 4-5 |
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| | | | श्लोक 4.58.4-5  | पुरा वृत्रवधे वृत्ते स चाहं च जयैषिणौ।
आदित्यमुपयातौ स्वो ज्वलन्तं रश्मिमालिनम्॥ ४॥
आवृत्याकाशमार्गेण जवेन स्वर्गतौ भृशम्।
मध्यं प्राप्ते तु सूर्ये तु जटायुरवसीदति॥ ५॥ | | | | | | अनुवाद | | 'बहुत समय पहले की बात है, जब इंद्र ने वृत्रासुर का वध कर दिया था, तब इंद्र को अत्यंत शक्तिशाली जानकर हम दोनों भाई उसे परास्त करने की इच्छा से आकाश मार्ग से बड़े वेग से स्वर्ग की ओर चल पड़े। इंद्र को परास्त करके लौटते समय हम दोनों स्वर्ग को प्रकाशित करने वाले सूर्य के निकट पहुँचे। हममें से जटायु मध्याह्न के समय सूर्य के तेज से दुर्बल होने लगा। | | | | ‘It happened long ago when Vritraasura was killed by Indra, then knowing Indra to be very powerful, both of us brothers went to heaven with great speed through the sky route with the desire to defeat him. While returning after defeating Indra, both of us came near the Sun who illuminates the heaven. Among us, Jatayu started getting weakened by the brightness of the Sun during the noon time. | | ✨ ai-generated | | |
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