श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 58: सम्पाति का अपने पंख जलने की कथा सुनाना, सीता और रावण का पता बताना तथा वानरों की सहायता से समुद्र-तट पर जाकर भाई को जलाञ्जलि देना  »  श्लोक 36-37
 
 
श्लोक  4.58.36-37 
ततो नीत्वा तु तं देशं तीरे नदनदीपते:।
निर्दग्धपक्षं सम्पातिं वानरा: सुमहौजस:॥ ३६॥
तं पुन: प्रापयित्वा च तं देशं पतगेश्वरम्।
बभूवुर्वानरा हृष्टा: प्रवृत्तिमुपलभ्य ते॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
यह सुनकर महाबली वानरों ने जले हुए पंखों वाले पक्षीराज सम्पाती को उठाकर समुद्र तट पर ले आए। उन्हें जल पिलाकर पुनः वहाँ से उठाकर उनके निवास स्थान पर पहुँचा दिया। उनसे सीता का समाचार सुनकर सभी वानरों को बहुत प्रसन्नता हुई।
 
On hearing this, the mighty monkeys picked up the bird king Sampati with burnt wings and brought him to the seashore. After offering water to him, they picked him up again from there and brought him to his place of residence. All the monkeys were very happy to hear the news of Sita from him.
 
इत्यार्षे श्रीमद्रामायाणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे अष्टपञ्चाश: सर्ग: ॥ ५ ८॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें अट्ठावनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५ ८॥
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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