श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 58: सम्पाति का अपने पंख जलने की कथा सुनाना, सीता और रावण का पता बताना तथा वानरों की सहायता से समुद्र-तट पर जाकर भाई को जलाञ्जलि देना  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  4.58.34 
उपायो दृश्यतां कश्चिल्लङ्घने लवणाम्भस:।
अभिगम्य तु वैदेहीं समृद्धार्था गमिष्यथ॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
'अब तुम इस खारे पानी के समुद्र को पार करने का कोई उपाय सोचो। तुम विदेहकुमारी सीता के पास जाओगे और अपनी मनोकामना पूरी होने पर किष्किन्धपुरी लौट आओगे।'
 
‘Now you must think of a way to cross this sea of ​​salty water. You will go to Videha Kumari Sita and return to Kishkindapuri after your wishes were fulfilled.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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