श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 58: सम्पाति का अपने पंख जलने की कथा सुनाना, सीता और रावण का पता बताना तथा वानरों की सहायता से समुद्र-तट पर जाकर भाई को जलाञ्जलि देना  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  4.58.33 
अस्माकं विहिता वृत्तिर्निसर्गेण च दूरत:।
विहिता वृक्षमूले तु वृत्तिश्चरणयोधिनाम्॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
‘हमारे जातीय स्वभाव के अनुसार हमारी जीविका दूर से दिखाई देने वाले भोजन से निर्धारित होती है और पक्षी आदि पक्षियों की जीविका वृक्षों की जड़ों तक ही सीमित है - वहाँ जो कुछ भी उपलब्ध होता है, उसी पर वे जीवित रहते हैं।॥33॥
 
‘According to our racial nature, our livelihood is determined by the distant food seen from afar, and the livelihood of birds like birds etc. is limited to the roots of trees - they survive on whatever is available there.॥ 33॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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