श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 58: सम्पाति का अपने पंख जलने की कथा सुनाना, सीता और रावण का पता बताना तथा वानरों की सहायता से समुद्र-तट पर जाकर भाई को जलाञ्जलि देना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  4.58.31 
इहस्थोऽहं प्रपश्यामि रावणं जानकीं तथा।
अस्माकमपि सौपर्णं दिव्यं चक्षुर्बलं तथा॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
मैं यहाँ से रावण और जानकी को देख सकता हूँ। गरुड़ की तरह हममें भी दूर तक देखने की दिव्य शक्ति है।
 
I can see Ravan and Janaki from here. We too, like Garuda, have the divine power to see far away.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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