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श्लोक 4.58.31  |
इहस्थोऽहं प्रपश्यामि रावणं जानकीं तथा।
अस्माकमपि सौपर्णं दिव्यं चक्षुर्बलं तथा॥ ३१॥ |
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| अनुवाद |
| मैं यहाँ से रावण और जानकी को देख सकता हूँ। गरुड़ की तरह हममें भी दूर तक देखने की दिव्य शक्ति है। |
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| I can see Ravan and Janaki from here. We too, like Garuda, have the divine power to see far away. |
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