श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 58: सम्पाति का अपने पंख जलने की कथा सुनाना, सीता और रावण का पता बताना तथा वानरों की सहायता से समुद्र-तट पर जाकर भाई को जलाञ्जलि देना  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  4.58.27 
द्वितीयो बलिभोजानां ये च वृक्षफलाशना:।
भासास्तृतीयं गच्छन्ति क्रौञ्चाश्च कुररै: सह॥ २७॥
 
 
अनुवाद
'उससे ऊपर दूसरा मार्ग कौओं आदि पक्षियों के लिए है, जो वृक्षों के फल खाकर जीवित रहते हैं। आकाश का तीसरा मार्ग, जो उससे भी ऊँचा है, उस पर गरुड़, सारस और कुरर आदि पक्षी रहते हैं॥ 27॥
 
‘The second path above that is for crows and other birds that live by eating the fruits of trees. The third path of the sky, which is higher than that, is used by birds like eagles, cranes and kurars.॥ 27॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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