श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 58: सम्पाति का अपने पंख जलने की कथा सुनाना, सीता और रावण का पता बताना तथा वानरों की सहायता से समुद्र-तट पर जाकर भाई को जलाञ्जलि देना  »  श्लोक 24-25
 
 
श्लोक  4.58.24-25 
लङ्कायामथ गुप्तायां सागरेण समन्तत:।
सम्प्राप्य सागरस्यान्तं सम्पूर्णं शतयोजनम्॥ २४॥
आसाद्य दक्षिणं तीरं ततो द्रक्ष्यथ रावणम्।
तत्रैव त्वरिता: क्षिप्रं विक्रमध्वं प्लवङ्गमा:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
लंका चारों ओर से समुद्र से सुरक्षित है। सौ योजन समुद्र पार करके उसके दक्षिणी तट पर पहुँचने पर ही तुम रावण को देख पाओगे। इसलिए हे वानरों! समुद्र पार करते ही अपना पराक्रम दिखाओ।
 
Lanka is protected by the ocean on all sides. You will be able to see Ravana only after crossing the ocean for a distance of hundred yojanas and reaching its southern shore. Therefore, O monkeys! Demonstrate your prowess immediately after crossing the ocean.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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