श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 58: सम्पाति का अपने पंख जलने की कथा सुनाना, सीता और रावण का पता बताना तथा वानरों की सहायता से समुद्र-तट पर जाकर भाई को जलाञ्जलि देना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  4.58.17 
सूर्यप्रभेव शैलाग्रे तस्या: कौशेयमुत्तमम्।
असिते राक्षसे भाति यथा वा तडिदम्बुदे॥ १७॥
 
 
अनुवाद
उसका सुन्दर पीत रेशमी वस्त्र उदयाचल पर्वत के शिखर पर फैली हुई सूर्य की प्रभा के समान शोभायमान हो रहा था। वह उस काले राक्षस के समीप बादलों में चमकती हुई बिजली के समान चमक रहा था॥17॥
 
‘Her beautiful yellow silken robe looked as beautiful as the radiance of the sun spreading over the peak of the mountain Udayaachal. It was shining like lightning flashing in the clouds near that black demon.॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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