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श्लोक 4.56.24  |
सूर्यांशुदग्धपक्षत्वान्न शक्नोमि विसर्पितुम्।
इच्छेयं पर्वतादस्मादवतर्तुमरिंदमा:॥ २४॥ |
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| अनुवाद |
| हे वीर शत्रुओं! सूर्य की किरणों से मेरे पंख जल गए हैं, अतः मैं उड़ नहीं सकता; परन्तु मैं इस पर्वत से नीचे उतरना चाहता हूँ।॥24॥ |
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| O brave enemies! My wings have been burnt by the rays of the sun, so I cannot fly; but I want to come down from this mountain.'॥ 24॥ |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे षट्पञ्चाश: सर्ग: ॥ ५ ६॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें छप्पनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५ ६॥ |
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