श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 55: अङ्गद सहित वानरों का प्रायोपवेशन  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  4.55.7 
तस्मिन् पापे कृतघ्ने तु स्मृतिभिन्ने चलात्मनि।
आर्य: को विश्वसेज्जातु तत्कुलीनो विशेषत:॥ ७॥
 
 
अनुवाद
कोई भी महापुरुष, विशेषकर उसके कुल में उत्पन्न हुआ कोई भी पुरुष, उस पापी, कृतघ्न, स्मृतिहीन और चंचल बुद्धि वाले सुग्रीव पर कैसे श्रद्धा कर सकता है?॥ 7॥
 
‘How can any great man, especially one born in his family, ever have faith in that sinful, ungrateful, lacking in memory and fickle-minded Sugreeva?॥ 7॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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