श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 55: अङ्गद सहित वानरों का प्रायोपवेशन  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  4.55.2 
स्थैर्यमात्ममन:शौचमानृशंस्यमथार्जवम्।
विक्रमश्चैव धैर्यं च सुग्रीवे नोपपद्यते॥ २॥
 
 
अनुवाद
हे वानरश्रेष्ठ! राजा सुग्रीव में स्थिरता, शरीर और मन की पवित्रता, क्रूरता का अभाव, सरलता, वीरता और धैर्य है, ऐसा मानना ​​ठीक नहीं लगता।॥ 2॥
 
O best of the apes! The belief that King Sugreeva has stability, purity of body and mind, absence of cruelty, simplicity, valour and patience does not seem to be correct.॥ 2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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