श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 53: लौटने की अवधि बीत जाने पर भी कार्य सिद्ध न होने के कारण सुग्रीव के कठोर दण्ड से डरने वाले अङ्गद आदि वानरों का उपवास करके प्राण त्याग देने का निश्चय  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  4.53.23 
न क्षमं चापराद्धानां गमनं स्वामिपार्श्वत:।
प्रधानभूताश्च वयं सुग्रीवस्य समागता:॥ २३॥
 
 
अनुवाद
अतः अपराधी पुरुषों का अपने स्वामी के पास लौटना कभी उचित नहीं है। सुग्रीव के प्रधान सेवक होने के कारण हम उनके भेजने पर यहाँ आये हैं॥ 23॥
 
‘Therefore, it is never appropriate for criminal men to return to their master. Being Sugreeva's chief associate or servant, we came here on his sending.॥ 23॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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