श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 53: लौटने की अवधि बीत जाने पर भी कार्य सिद्ध न होने के कारण सुग्रीव के कठोर दण्ड से डरने वाले अङ्गद आदि वानरों का उपवास करके प्राण त्याग देने का निश्चय  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  4.53.19 
किं मे सुहृद्भिर्व्यसनं पश्यद्भिर्जीवितान्तरे।
इहैव प्रायमासिष्ये पुण्ये सागररोधसि॥ १९॥
 
 
अनुवाद
"मेरे उन मित्रों से मेरा क्या लेना-देना, जिन्होंने मेरे जीवनकाल में राजा के हाथों मेरी मृत्यु देखी थी? यहाँ समुद्र के पवित्र तट पर मैं मृत्युपर्यन्त उपवास करूँगा।" ॥19॥
 
"What have I to do with my friends who witnessed my death at the hands of the king during my lifetime? Here on the sacred shore of the sea I will fast till my death." ॥19॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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