श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 53: लौटने की अवधि बीत जाने पर भी कार्य सिद्ध न होने के कारण सुग्रीव के कठोर दण्ड से डरने वाले अङ्गद आदि वानरों का उपवास करके प्राण त्याग देने का निश्चय  »  श्लोक 17-18h
 
 
श्लोक  4.53.17-18h 
न चाहं यौवराज्येन सुग्रीवेणाभिषेचित:॥ १७॥
नरेन्द्रेणाभिषिक्तोऽस्मि रामेणाक्लिष्टकर्मणा।
 
 
अनुवाद
सुग्रीव ने मुझे युवराज पद पर अभिषिक्त नहीं किया। महान् कर्म करने वाले महाराज श्री राम ने मुझे युवराज पद पर अभिषिक्त किया है॥17 1/2॥
 
‘Sugreeva did not anoint me as the crown prince. Maharaja Shri Ram, the doer of great deeds, has anointed me as the crown prince.॥ 17 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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