श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 53: लौटने की अवधि बीत जाने पर भी कार्य सिद्ध न होने के कारण सुग्रीव के कठोर दण्ड से डरने वाले अङ्गद आदि वानरों का उपवास करके प्राण त्याग देने का निश्चय  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  4.53.10 
भवन्त: प्रत्ययं प्राप्ता नीतिमार्गविशारदा:।
हितेष्वभिरता भर्तुर्निसृष्टा: सर्वकर्मसु॥ १०॥
 
 
अनुवाद
आप सभी राजा के विश्वासपात्र हैं। आप नीति के मार्ग में पारंगत हैं और अपने स्वामी के हितार्थ सदैव तत्पर रहते हैं। इसीलिए आप सभी को समय पर सभी कार्यों के लिए नियुक्त किया गया है॥10॥
 
‘You all have the confidence of the king. You are well versed in the path of ethics and are always ready to work for the welfare of your master. That is why you all are appointed for all tasks at the right time.॥ 10॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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