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श्लोक 4.52.31-32  |
एष विन्ध्यो गिरि: श्रीमान् नानाद्रुमलतायुत:॥ ३१॥
एष प्रस्रवण: शैल: सागरोऽयं महोदधि:।
स्वस्ति वोऽस्तु गमिष्यामि भवनं वानरर्षभा:।
इत्युक्त्वा तद् बिलं श्रीमत् प्रविवेश स्वयंप्रभा॥ ३२॥ |
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| अनुवाद |
| हे श्रेष्ठ वानरों! यहाँ नाना प्रकार के वृक्षों और लताओं से आच्छादित सुन्दर विन्ध्यगिरि है। इस ओर प्रस्रवणगिरि है और आगे समुद्र है। तुम्हारा कल्याण हो। अब मैं अपने धाम को जा रहा हूँ।' ऐसा कहकर स्वयंप्रभा उस सुन्दर गुफा में चली गईं। |
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| O noble monkeys! Here is the beautiful Vindhyagiri, covered with various kinds of trees and creepers. On this side is Prasravanagiri and in front is the ocean. May you be blessed. Now I am going to my place.' Saying this, Swayamprabha went into that beautiful cave. |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे द्विपञ्चाश: सर्ग: ॥ ५ २॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें बावनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५ २॥ |
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